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Archives Volume-16, Issue-1 (January-June)

TABLE OF CONTENTS

Paper Title:
बहुमाध्यम उपागम की शैक्षिक उपयोगिता: नीति और व्यवहार का विश्लेषण
Author Name:
सुश्री पुष्पलता बारला & आदित्य प्रकाश सक्सेना
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20280133
Page No.:
1-10
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बहुमाध्यम उपागम की शैक्षिक उपयोगिता: नीति और व्यवहार का विश्लेषण
Author: सुश्री पुष्पलता बारला & आदित्य प्रकाश सक्सेना

भूमिका
वर्तमान शोध का उद्देश्य बहुमाध्यम उपागम की शैक्षिक उपयोगिता का नीति और व्यवहारिक संदर्भ में विश्लेषण करना है। बहुमाध्यम उपागम में शिक्षण सामग्री को पाठ, चित्र, ऑडियो, वीडियो, एनीमेशन तथा इंटरएक्टिव संसाधनों के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाता है, जिससे शिक्षण अधिक रोचक, अनुभवात्मक और प्रभावी बनता है। शोध में इस उपागम के वास्तविक कक्षागत उपयोग, शिक्षकों की भूमिका, विद्यार्थियों की उपलब्धि तथा सहभागिता का परीक्षण किया गया। अध्ययन में यह भी विश्लेषित किया गया कि नई शिक्षा नीति–2020 किस प्रकार शिक्षण–अधिगम प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी, डिजिटल संसाधन तथा मल्टीमीडिया आधारित शिक्षण को बढ़ावा देती है। डेटा संग्रह हेतु प्रश्नावली, अवलोकन तथा उपलब्धि परीक्षण का प्रयोग किया गया और परिणामों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि बहुमाध्यम आधारित शिक्षण न केवल विद्यार्थियों की शैक्षिक उपलब्धि को बढ़ाता है, बल्कि उनके सीखने की रुचि, अवधारणात्मक स्पष्टता, रचनात्मकता और कौशल विकास को भी प्रोत्साहित करता है। व्यवहारिक दृष्टि से यह पाया गया कि कुछ विद्यालयों में संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक और तकनीक

Paper Title:
‘हस्तिनापुर’ और ‘देहान्तर’ में स्त्री–अधिकारों के प्रश्‍न
Author Name:
रोहित कुमार पटेल
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20283099
Page No.:
11-15
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‘हस्तिनापुर’ और ‘देहान्तर’ में स्त्री–अधिकारों के प्रश्‍न
Author: रोहित कुमार पटेल

शोध–सारांश :–
नन्द किशोर आचार्य एक ऐसे साहित्यकार हैं जिनकी दृष्टि ऐतिहासिक–पौराणिक स्त्री चरित्रों पर खूब गई है। उन्होंने इस तथ्य को महसूस किया है कि यद्यपि भारतीय समाज में स्त्रियों को देवी का रूप माना जाता है लेकिन धरातल पर स्थिति बिल्कुल भिन्न है। देवी कही जाने वाली स्त्रियाँ अपने साधारण अधिकार भी प्राप्त नहीं कर सकी हैं। राजमहलों में राजा के कमरों में रहने वाली पटरानियों से लेकर सामान्य घरों तक कहीं भी स्त्री को वह सम्मान नहीं मिलता है जो उसे मिलना चाहिए। नन्द किशोर आचार्य ने इसी लिए अपने नाटकों में सामाजिक परिस्थितियों से त्रस्त स्त्री–चरित्रों को उभारा है जिन्होंने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई है। यह कहने में आज भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि स्त्रियाँ अभी भी शोषित हैं। भारतीय समाज और सरकार भले ही यह दावा करे कि आज स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूरा नैरेटिव एकपक्षीय है। दरअसल यह बात वही स्त्रियाँ या पुरुष कहते हैं जो पितृसत्तात्मक समाज के समर्थक हैं। आजाद स्त्रियाँ, अपने पंखों को खूब फैलाने वाली स्त्रियाँ, आजादी से आकाश में

Paper Title:
CONCEPTUALISING VINAYAK DAMODAR SAVARKAR AND NATIONAL INTEGRATION OF INDIA
Author Name:
Jitendra Kumar
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20283235
Page No.:
16-25
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CONCEPTUALISING VINAYAK DAMODAR SAVARKAR AND NATIONAL INTEGRATION OF INDIA
Author: Jitendra Kumar

INTRODUCTION:
Hindu nationalism, or “Hindutva”, is a political and cultural ideology that seeks to define Indian identity through the lens of Hindu values tradition and heritage. The concept is rooted in the idea that India, historically known as Hindustan (the land of Hindus), should be a nation where the majority Hindu population sets the direction and goals of the State. This ideology is shaped by five key elements: land, race, religion, culture, and language, all of which are considered inherently Hindu by its proponents.

Paper Title:
मैथिली साहित्य आ अनुवाद
Author Name:
अनामिका
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20324380
Page No.:
26-30
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मैथिली साहित्य आ अनुवाद
Author: अनामिका

रसास्वादन मनुष्यक प्रवृत्ति अछि। जे दुनियाक समस्त व्यंजक स्वाद मिथिला के उपलब्ध भऽ जाय तँ दुनिया चक्कर कटबाक कोनो जरूरी? साहित्य समस्त साहित्य जे मिथिला मे भऽ जाय तँ एहि भागम भाग सँ भरल जीवन मे आन भाषाक अध्ययन कठिन अछि। जे लगाव अपन माय सँ होइछ ओ लगाव सतमाय सँ नही होइछ। तेना भाषा रूपी सतमाय सँ पाँछा छोड़एबाक काज करैत छथि कोनो कुशल अनुवादक वएह छथि जे कोनो भाषाक मौलिक स्वाद सँ रसास्वादन करैत छथि। चीनी भाषाक साहित्य सँ हम अपन मातृभाषा मे अवगत भऽ जाएब तखन हमरा लेल चीनी भाषा पढ़बाक कोनो प्रयोजन जेना आमक स्वाद रस मे भेटैछ नहि कि गुठली मे। अथति कोनो भाषा मे अभिव्यक्त विचार केँ दोसर भाषा मे यथावत प्रस्तुति अनुवाद अछि। जाहि भाषा सँ अनुवाद कयल जाइत अछि ओकर मूल भाषा कहल जाइत अछि। जहि भाषा मे अनुवाद कयल जाइत अछि ओकरा लक्ष्य भाषा कहल जाइत अछि। साहित्य समाजक सभ्यता संस्कृति गुण-दोष उद्भव-पराभव ओहि ठामक इतिहास मे गुम्फित रहैत अछि। तँ कोनो सभ्यता-संस्कृति केँ जनबाक लेल ओहि ठामक भाषा साहित्यक अध्ययन आवश्यक अछि। ‘अनुवाद’ शब्दक उत्पत्ति ‘वाद’ धातु मे ‘अनु’ उपसर्ग जुड़ला सँ बनल आ जकर अर्थ होइछ अभिव्यक्त विचार

Paper Title:
सुभद्रा–महादेवी के गद्य-साहित्य का तुलनात्मक विवेचन
Author Name:
खुशबू कुमारी
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20324629
Page No.:
31-36
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सुभद्रा–महादेवी के गद्य-साहित्य का तुलनात्मक विवेचन
Author: खुशबू कुमारी

शोध-सार–
सुभद्रा कुमारी चौहान और महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य की दो महत्वपूर्ण रचनाकार हैं, जिन्होंने गद्य और पद्य दोनों क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। यद्यपि दोनों को मुख्यतः कवयित्री के रूप में जाना जाता है, फिर भी उनके गद्य साहित्य में सामाजिक चेतना, स्त्री-जीवन, मानवीय संवेदना तथा राष्ट्रीय भावना का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। प्रस्तुत शोध का उद्देश्य दोनों लेखिकाओं के गद्य साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन करना है, ताकि उनकी वैचारिक समानताओं एवं भिन्नताओं को स्पष्ट किया जा सके।
सुभद्रा कुमारी चौहान के गद्य में राष्ट्रीय चेतना, स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक संघर्ष तथा सामान्य जनजीवन की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। उनकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और जनसामान्य के निकट है। वे अपने गद्य में समाज की कुरीतियों, स्त्री-पीड़ा तथा देशभक्ति को अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत करती हैं। उनके कथानकों में यथार्थ और संघर्ष की प्रधानता मिलती है।
दूसरी ओर, महादेवी वर्मा का गद्य भावप्रधान, संवेदनशील तथा दार्शनिक प्रवृत्ति का है। उनके निबंधों और संस्मरणों में करुणा, मानवीय मूल्य, नारी चेतना और

Paper Title:
हरिराम मीणा के साहित्य में आदिवासी संस्कृति का चित्रण : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Author Name:
भावना कुमारी
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20325740
Page No.:
37-42
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हरिराम मीणा के साहित्य में आदिवासी संस्कृति का चित्रण : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Author: भावना कुमारी

शोध-सारांश :–
समकालीन हिंदी साहित्य में आदिवासी विमर्श ने एक महत्वपूर्ण वैचारिक धारा के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इस विमर्श को साहित्यिक और वैचारिक आधार प्रदान करने वाले प्रमुख रचनाकारों में हरिराम मीणा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उनके साहित्य में आदिवासी समाज की जीवन-दृष्टि, सांस्कृतिक चेतना, प्रकृति के साथ उसका संबंध, सामुदायिक संरचना, स्त्री-सम्मान, प्रतिरोध और पारंपरिक ज्ञान का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। प्रस्तुत शोधपत्र में हरिराम मीणा के प्रमुख उपन्यास ‘धूणी तपे तीर’ और ‘डांग’ के आधार पर आदिवासी संस्कृति के विविध आयामों का विश्‍लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि लेखक ने आदिवासी जीवन को किसी पिछड़े अथवा दया के पात्र समुदाय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे एक स्वतंत्र सांस्कृतिक और दार्शनिक सत्ता के रूप में स्थापित किया है। उनके साहित्य में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, सामूहिकता की भावना, स्त्री-अस्मिता का सम्मान, लोकज्ञान की वैज्ञानिकता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। यह शोधपत्र इस तथ्य को रेखांकित करता है कि हरिराम

Paper Title:
प्रेमचंद के उपन्यासों में दलित जीवन की अभिव्यक्ति
Author Name:
पूजा कुमारी
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20325813
Page No.:
43-46
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प्रेमचंद के उपन्यासों में दलित जीवन की अभिव्यक्ति
Author: पूजा कुमारी

प्रस्तावना
हिंदी साहित्य के विकास में प्रेमचंद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने अपने उपन्यासों और कहानियों में भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों का यथार्थपूर्ण चित्रण किया है। विशेष रूप से ग्रामीण समाज, जाति-व्यवस्था, आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता उनके साहित्य के प्रमुख विषय रहे हैं।
भारतीय समाज में दलित वर्ग लंबे समय तक सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से शोषित रहा है। साहित्य में इस वर्ग की स्थिति को उजागर करना एक महत्वपूर्ण सामाजिक कार्य रहा है। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में दलित जीवन को केवल सहानुभूति के रूप में ही नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की आलोचना के रूप में भी प्रस्तुत किया है। हालाँकि उनके अधिकांश उपन्यासों में दलित पात्र मुख्य पात्र नहीं हैं, फिर भी गौण पात्रों के माध्यम से उन्होंने दलितों के जीवन की पीडा, संघर्ष और सामाजिक अपमान को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कियाहैं। भारतीय समाज की वर्ण-व्यवस्था ने सदियों तक दलित समुदाय को सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा। उन्हें अस्पृश्य माना गया, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों में प्रवेश से रोका गया, तथा शिक्षा और

Paper Title:
कक्षा माध्यम और लिंग के अनुसार शारीरिक शिक्षा में रुचि का तुलनात्मक अध्ययन
Author Name:
कुमकुम कुमारी
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20377365
Page No.:
47-51
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कक्षा माध्यम और लिंग के अनुसार शारीरिक शिक्षा में रुचि का तुलनात्मक अध्ययन
Author: कुमकुम कुमारी

शोध सारांशः
प्रस्तुत शोध अध्ययन दरभंगा जिले के माध्यमिक विद्यालयों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं में कक्षा माध्यम (हिंदी एवं अंग्रेजी) तथा लिंग (बालक एवं बालिका) के आधार पर शारीरिक शिक्षा में रुचि की तुलना करने हेतु किया गया है। अध्ययन में कुल 240 प्रतिभागियों (120 बालक एवं 120 बालिका) को यादृच्छिक प्रतिचयन विधि द्वारा चुना गया। आंकड़ों के संग्रह हेतु एक मानकीकृत प्रश्नावली का प्रयोग किया गया। परिणामों के विश्लेषण हेतु ज-परीक्षण एवं वर्णनात्मक सांख्यिकी का उपयोग किया गया। अध्ययन के निष्कर्षों से स्पष्ट हुआ कि बालकों की अपेक्षा बालिकाओं में शारीरिक शिक्षा के प्रति रुचि कम है तथा अंग्रेजी माध्यम के छात्रों में हिंदी माध्यम के छात्रों की तुलना में शारीरिक शिक्षा के प्रति अधिक रुचि पाई गई। शोध से यह भी स्पष्ट हुआ कि माध्यम और लिंग दोनों का शारीरिक शिक्षा में रुचि पर सार्थक प्रभाव पड़ता है।
मुख्य शब्दः शारीरिक शिक्षा, रुचि, कक्षा माध्यम, लिंग, दरभंगा

Paper Title:
महात्मा गांधी के विचारों पर भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्यों का प्रभाव
Author Name:
प्रमोद कुमार साह
Country:
India
DOI:
https://doi.org/10.5281/zenodo.20378097
Page No.:
52-59
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महात्मा गांधी के विचारों पर भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्यों का प्रभाव
Author: प्रमोद कुमार साह

सारांश :
महात्मा गांधी के विचारों एवं जीवन-दर्शन पर भारतीय तथा पाश्चात्य दोनों प्रकार के साहित्य और चिंतकों का गहरा प्रभाव पड़ा। भारतीय परंपरा में वे विशेष रूप से वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता, जैन धर्मग्रंथों तथा हिंदू धार्मिक संस्कारों से प्रभावित थे। उनके पारिवारिक वातावरण, माता पुतलीबाई की धार्मिकता तथा पिता कर्मचंद गांधी की सत्यनिष्ठा ने गांधीजी के व्यक्तित्व को नैतिक आधार प्रदान किया। बाल्यकाल में श्रवण कुमार और सत्यवादी हरिश्चंद्र की कथाओं ने उनके मन में सत्य, कर्तव्य और त्याग की भावना विकसित की।
गांधीजी के जीवन में गीता का विशेष महत्व था। उन्होंने गीता को अपना “आध्यात्मिक शब्दकोश” माना। गीता के निष्काम कर्म, अनासक्ति और आत्मसंयम के सिद्धांतों ने उनके सत्याग्रह और अहिंसा के विचारों को मजबूत किया। जैन धर्म के अहिंसा, अपरिग्रह और सादगी के सिद्धांतों का भी उनके जीवन और राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। रायचंदभाई मेहता ने गांधीजी को आत्मसंयम और आध्यात्मिक चिंतन की दिशा दी, जबकि गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें राजनीति में नैतिकता और सेवा का मार्ग दिखाया।
पाश्चात्य साहित्य में बाइबल के “पर्

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