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Archives Volume-15, Issue-2 (July-December)

TABLE OF CONTENTS

Paper Title:
SPATIAL PATTERNS OF SOCIO-ECONOMIC DEVELOPMENT IN THE DARBHANGA–MADHUBANI REGION: A BLOCK-LEVEL GEOGRAPHICAL ANALYSIS
Author Name:
Bablu Kumar Singh
Country:
India
Page No.:
1-10
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SPATIAL PATTERNS OF SOCIO-ECONOMIC DEVELOPMENT IN THE DARBHANGA–MADHUBANI REGION: A BLOCK-LEVEL GEOGRAPHICAL ANALYSIS
Author: Bablu Kumar Singh

ABSTRACT
The Darbhanga–Madhubani region of north Bihar forms a historically integrated Maithil
cultural landscape, but its internal development pattern is spatially uneven. This study
analyses block-level socio-economic development using secondary data from Census 2011, District Census Handbooks, NFHS-5 based district profiles, Bihar statistical sources, and public development indicators. The study constructs a Composite Development Index (CDI) using selected indicators related to literacy, female literacy, work participation, non-farm diversification, urban proximity, road and institutional access, health–nutrition conditions, and demographic pressure. The analysis shows that development is concentrated around district headquarters, urban corridors, transport-linked blocks, and administrative-service centres such as Darbhanga, Bahadurpur, Benipur, Madhubani, Pandaul, Rajnagar, Jhanjharpur, and Jainagar. Peripheral flood-prone and low-connectivity blocks such as Kusheshwar Asthan, K

Paper Title:
THE POETICS OF THE ORDINARY: DOMESTIC SPACES, LOCAL STREETS, AND EVERYDAY RHYTHMS IN NARAYAN AND CHAUDHURI
Author Name:
Malakar Shephali
Country:
India
Page No.:
11-15
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THE POETICS OF THE ORDINARY: DOMESTIC SPACES, LOCAL STREETS, AND EVERYDAY RHYTHMS IN NARAYAN AND CHAUDHURI
Author: Malakar Shephali

This paper examines the literary aesthetics of ordinary life in R. K. Narayan and Amit
Chaudhuri, with special attention to domestic interiors, neighbourhood streets, family
routines, local speech, and the slow rhythms of small-town and urban India. Narayan’s
Malgudi and Chaudhuri’s Calcutta are not merely settings; they are lived spaces where social relations, memory, class, habit, and cultural identity take narrative form. The study argues that both writers resist spectacle and large historical drama by turning everyday experience into a refined literary method. Narayan’s ordinary world is organized through irony, moral comedy, and a compact narrative structure, while Chaudhuri’s ordinary world is shaped through sensory attention, musical pacing, domestic observation, and fragmentary urban memory. The paper shows that the ordinary, in both writers, becomes a serious aesthetic category through which Indian English fiction represents social change without abandoning intimacy, loc

Paper Title:
ग्रामीण बिहार में गरीबी उन्मूलन की दिशा में विश्व बैंक द्वारा संचालित कार्यक्रमों की भूमिका: उपलब्धियाँ, सीमाएँ और चुनौतियाँ
Author Name:
मितु कुमारी
Country:
India
Page No.:
16-23
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ग्रामीण बिहार में गरीबी उन्मूलन की दिशा में विश्व बैंक द्वारा संचालित कार्यक्रमों की भूमिका: उपलब्धियाँ, सीमाएँ और चुनौतियाँ
Author: मितु कुमारी

ग्रामीण बिहार में गरीबी केवल आय की कमी नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, वित्तीय पहुँच, आजीविका-सुरक्षा, सामाजिक भागीदारी और बुनियादी सुविधाओं की सम्मिलित वंचना के रूप में दिखाई देती है। इस संदर्भ में विश्व बैंक समर्थित बिहार ग्रामीण आजीविका परियोजना, जिसे “जीविका” के नाम से जाना जाता है, ग्रामीण निर्धन परिवारों, विशेषकर महिलाओं, को स्वयं सहायता समूहों, सामुदायिक संस्थाओं, बैंक-लिंकेज, आजीविका प्रशिक्षण और सामाजिक सशक्तीकरण से जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम रहा है। प्रस्तुत शोध-पत्र द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है और इसमें विश्व बैंक, नीति आयोग, यूएनडीपी, बिहार ग्रामीण आजीविका संवर्धन सोसाइटी तथा प्रभाव-मूल्यांकन अध्ययनों से प्राप्त सूचनाओं का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि बिहार में बहुआयामी गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है, किंतु गरीबी का ग्रामीण चरित्र अब भी गहरा है। जीविका जैसे कार्यक्रमों ने महिलाओं की सामूहिकता, कम लागत वाले ऋण, वित्तीय समावेशन, सामाजिक जागरूकता और आजीविका-विविधीकरण में सकारात्मक भूमिका निभाई है। फिर भी आय-वृद्धि की स्थिरता, कौशल-आधारित

Paper Title:
NARRATIVES OF BELONGING: HOME, EXILE, AND IDENTITY IN V. S. NAIPAUL AND CHIMAMANDA NGOZI ADICHIE
Author Name:
Saroj Kumar Ray
Country:
India
Page No.:
24-28
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NARRATIVES OF BELONGING: HOME, EXILE, AND IDENTITY IN V. S. NAIPAUL AND CHIMAMANDA NGOZI ADICHIE
Author: Saroj Kumar Ray

This study examines the interrelated motifs of home, exile, and identity in the selected works of V. S. Naipaul and Chimamanda Ngozi Adichie. Although both writers engage with postcolonial displacement, their narrative temperaments differ sharply. Naipaul often represents belonging as fractured, unstable, and historically burdened, while Adichie presents identity as mobile, dialogic, and capable of renewal through memory, language, gendered agency, and return. Through a comparative reading of A House for Mr Biswas, The Enigma of Arrival, Half of a Yellow Sun, and Americanah, the study argues that the idea of “home” in postcolonial writing is not merely geographical; it is emotional, linguistic, racial, historical, and political. Naipaul’s fiction foregrounds homelessness as an existential condition shaped by colonial migration, while Adichie’s fiction transforms exile into a site of self-recognition and critique. The study concludes that both writers expand the meaning of belonging by

Paper Title:
हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता का महत्व : समकालीन मीडिया परिदृश्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन
Author Name:
दर्शन सुधाकर
Country:
India
Page No.:
29-33
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हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता का महत्व : समकालीन मीडिया परिदृश्य का विश्लेषणात्मक अध्ययन
Author: दर्शन सुधाकर

इक्कीसवीं सदी को सूचना और संचार क्रांति का युग माना जाता है। इंटरनेट तकनीक के तीव्र विकास ने पत्रकारिता की पारंपरिक अवधारणा को बदलते हुए उसे डिजिटल स्वरूप प्रदान किया है। हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता आज केवल समाचार प्रसारण का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, लोकतांत्रिक विमर्श और जनसरोकारों का प्रभावशाली मंच बन चुकी है। डिजिटल तकनीकों, स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म, वेब-पोर्टल, ब्लॉग तथा मोबाइल एप्लिकेशनों ने हिंदी पत्रकारिता की पहुँच को राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर वैश्विक स्तर तक विस्तारित किया है।
हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता ने सूचना के लोकतंत्रीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके माध्यम से समाज का सामान्य नागरिक भी अभिव्यक्ति की प्रक्रिया में सहभागी बन सका है। आज समाचार केवल बड़े मीडिया संस्थानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि डिजिटल माध्यमों के कारण वैकल्पिक विचारधाराओं और स्थानीय मुद्दों को भी व्यापक मंच प्राप्त हुआ है। इंटरनेट पत्रकारिता ने समाचारों को तात्कालिक, बहुमाध्यमीय और अधिक संवादात्मक बनाया है।

Paper Title:
समेकित बाल विकास योजना के अंतर्गत पूरक पोषण कार्यक्रम का मूल्यांकन: बिहार राज्य के चयनित जिलों का अध्ययन
Author Name:
रिंकी कुमारी
Country:
India
Page No.:
34-41
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समेकित बाल विकास योजना के अंतर्गत पूरक पोषण कार्यक्रम का मूल्यांकन: बिहार राज्य के चयनित जिलों का अध्ययन
Author: रिंकी कुमारी

भारत में कुपोषण एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक समस्या रही है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव 0 से 6 वर्ष की आयु के बच्चों तथा गर्भवती एवं धात्री माताओं पर पड़ता है। इस समस्या के समाधान हेतु भारत सरकार द्वारा समेकित बाल विकास योजना का संचालन किया जा रहा है, जिसमें पूरक पोषण कार्यक्रम एक प्रमुख घटक है। यह शोध पत्र बिहार राज्य के तीन चयनित जिलों (गया, पूर्णिया और मुजफ्फरपुर) में पूरक पोषण कार्यक्रम के क्रियान्वयन और इसके आर्थिक व स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों का मूल्यांकन करता है। अध्ययन में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के द्वितीयक आंकड़ों के साथ-साथ 30 आंगनवाड़ी केंद्रों के 300 लाभार्थियों से प्राप्त प्राथमिक आंकड़ों का उपयोग किया गया है। आंकड़ों के विश्लेषण हेतु प्रतिशत विधि और काई-वर्ग सांख्यिकीय परीक्षण का प्रयोग किया गया है। अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि योजना के कारण गंभीर कुपोषण में कमी आई है और मानव पूंजी निर्माण में सहायता मिली है, लेकिन आपूर्ति श्रृंखला में अनियमितता, बुनियादी ढांचे की कमी और ढांचागत बाधाओं के कारण कार्यक्रम अपनी पूर्ण आर्थिक और सामाजिक क्षमता प्राप्त करने

Paper Title:
दलित साहित्यकार तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में अभिव्यक्‍त लोक–जीवन
Author Name:
जय प्रकाश कुमार
Country:
India
Page No.:
42-47
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दलित साहित्यकार तुलसीराम की आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ में अभिव्यक्‍त लोक–जीवन
Author: जय प्रकाश कुमार

शोध–सारांश :-
इक्कीसवीं सदी को विमर्शों की शताब्दी कहा जाता है। सदियों से हाशिए पर रहे लोगों ने वर्तमान युग में अपनी आवाज को बुलंद करना आरम्भ किया। दरअसल पिछली सदी में ही महान विचारकों और चिंतकों ने दलित वैचारिकी की ठोस पृष्ठभूमि का निर्माण किया उसी पर आज दलित साहित्य की मजबूत इमारत खड़ी हो रही है। जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय के प्रोफेसर रहे तुलसीराम जी ने अपनी आत्मकथा दो खंडों में लिखी है। पहला खंड ‘मुर्दहिया’ और दूसरा खंड ‘मणिकर्णिका’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुका है। अगर वे कुछ दिन और जीवित रहते तो निश्चित ही उनकी आत्मकथा का तीसरा खंड भी प्रकाशित होता, यह बात उन्होंने स्वयं लिखी है। तुलसीराम जी की विशेषता यह है कि उनकी आत्मकथा में एक तरफ जातीय शोषण का विद्रूप चित्रण है तो दूसरी तरफ ग्रामीण लोक–जीवन के मनोरम दृश्य भी बहुत सुंदरता से उकेरे गए हैं। पीड़ा, व्यथा और दुख के घने अंधकार के बीच लोक–जीवन के अनेक रंग उनकी आत्मकथा में अभिव्यक्‍त होते हैं। इसी लिए उनकी आत्मकथा अन्य दलित आत्मकथाकारों से थोड़ी अलग और अधिक रोचक है। तुलसीराम के संपूर्ण व्यक्तित्व का अनुशीलन करने पर यह बात स्पष्ट होती

Paper Title:
सोशल मीडिया के युग में युवा समाज: डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति का विमर्श
Author Name:
अंजू कुमारी
Country:
India
Page No.:
48-53
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सोशल मीडिया के युग में युवा समाज: डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति का विमर्श
Author: अंजू कुमारी

सारांश
यह शोध-पत्र सोशल मीडिया के युग में युवा समाज की बदलती संरचना का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्र डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति है। शोध मुख्यतः द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है, जिनमें DataReportal, IAMAI-Kantar, ASER, UNICEF, Pew Research Center तथा प्रमुख समाजशास्त्रीय अध्ययनों का उपयोग किया गया है। विश्लेषण को सांख्यिकीय आधार देने के लिए 18–25 वर्ष आयु-वर्ग के 200 युवाओं पर आधारित एक संरचित सर्वेक्षण-डेटासेट का परीक्षण भी प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया ने युवाओं को नागरिक अभिव्यक्ति, सामाजिक मुद्दों पर भागीदारी और पहचान-निर्माण के नए अवसर दिए हैं, पर साथ ही डिजिटल थकान, सामाजिक अलगाव, प्रदर्शन-दबाव, ऑनलाइन ध्रुवीकरण और एल्गोरिथ्मिक पहचान-राजनीति जैसी चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। अध्ययन यह रेखांकित करता है कि सोशल मीडिया को केवल संचार-माध्यम नहीं, बल्कि समकालीन युवा समाज की सांस्कृतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में समझना आवश्यक है।
मुख्य शब्द: सोशल मीडिया, युवा समाज, डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव, पहचान-राजनीति, डिजिटल स

Paper Title:
छायावादी कविता में व्यक्तित्व-निर्माण, आत्मबोध और मानवीय मूल्य
Author Name:
नेहा कुमारी
Country:
India
Page No.:
54-59
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छायावादी कविता में व्यक्तित्व-निर्माण, आत्मबोध और मानवीय मूल्य
Author: नेहा कुमारी

सार
छायावादी कविता हिन्दी साहित्य की आधुनिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण चरण है, जिसमें व्यक्ति, आत्मा, प्रकृति, सौंदर्य, रहस्य, करुणा और मानवीय संवेदना को विशिष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति मिली। छायावाद को सामान्यतः आत्मपरक काव्यधारा कहा जाता है, परंतु इसकी आत्मपरकता संकीर्ण व्यक्तिवाद नहीं है; वह मनुष्य के आंतरिक विकास, आत्मबोध, स्वतंत्र व्यक्तित्व और उच्चतर मानवीय मूल्यों की खोज से जुड़ी हुई है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा की कविता में व्यक्तित्व-निर्माण केवल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक साधना के रूप में सामने आता है। प्रसाद के यहाँ आत्मबोध सांस्कृतिक स्मृति और मानव-गरिमा से जुड़ता है; पंत के यहाँ प्रकृति-सौंदर्य के माध्यम से मनुष्य के संवेदनात्मक विकास का मार्ग खुलता है; निराला के यहाँ व्यक्तित्व विद्रोह, स्वाभिमान और सामाजिक करुणा से निर्मित होता है; महादेवी वर्मा के यहाँ आत्मबोध वेदना, करुणा और आध्यात्मिक एकांत के माध्यम से मानवीय संवेदना को विस्तार देता है। इस शोध-पत्र में छायावादी कविता के आधार पर

Paper Title:
बिहार पंचायती राज में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी: प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण का अध्ययन
Author Name:
राजेश कुमार पुर्वे
Country:
India
Page No.:
60-65
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बिहार पंचायती राज में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी: प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण का अध्ययन
Author: राजेश कुमार पुर्वे

सारांश
बिहार पंचायती राज व्यवस्था में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की भागीदारी भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और स्थानीय स्वशासन के त्रिस्तरीय संबंध को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है। 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक ढाँचा निर्मित किया, जबकि बिहार ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण देकर इस प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाया। इस शोध-पत्र में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी को प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण के तीन विश्लेषणात्मक आयामों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन पूर्णतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है, जिसमें संविधान, बिहार पंचायती राज अधिनियम, सरकारी रिपोर्टों, पूर्व शोधों और उपलब्ध सांख्यिकीय सामग्री का उपयोग किया गया है। निष्कर्ष संकेत करते हैं कि आरक्षण ने दलित महिलाओं की संख्यात्मक उपस्थिति को मजबूत किया है, किंतु निर्णय-निर्माण में वास्तविक भागीदारी अभी भी जाति, पितृसत्ता, आर्थिक निर्भरता, प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी और ‘मुखिया-पति’ ज

Paper Title:
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों की भूमिका
Author Name:
प्रमोद कुमार साह
Country:
India
Page No.:
66-74
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वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों की भूमिका
Author: प्रमोद कुमार साह

सारांश
महात्‍मा गॉंधी द्वारा प्रतिपादित रचनात्मक कार्यक्रम भारतीय समाज और राजनीति के नैतिक पुनर्निर्माण का आधार रहे हैं। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जब लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण, सामाजिक विभाजन, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, हिंसा, धार्मिक कट्टरता तथा पर्यावरण संकट जैसी समस्याएँ बढ़ रही हैं, तब गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों की प्रासंगिकता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। गांधीजी का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज का नैतिक, आर्थिक और सामाजिक उत्थान भी आवश्यक है। गांधी के रचनात्मक कार्यक्रमों में ग्राम स्वराज, स्वदेशी, खादी, अस्पृश्यता उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण, सांप्रदायिक सद्भाव, बुनियादी शिक्षा, स्वच्छता तथा आत्मनिर्भरता जैसे तत्व प्रमुख थे। वर्तमान समय में “आत्मनिर्भर भारत”, ग्रामीण विकास, महिला भागीदारी, सामाजिक न्याय तथा पर्यावरण संरक्षण जैसी नीतियों में गांधीवादी विचारों की झलक स्पष्ट दिखाई देती है। राजनीतिक असहिष्णुता और वैचारिक संघर्ष के दौर में गांधी का सत्य, अहिंसा और संवाद का सिद्धांत लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में सहायक हो सकता है। यह श

Paper Title:
सोशल मीडिया के युग में युवा समाज: डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति का विमर्श
Author Name:
अंजू कुमारी
Country:
India
Page No.:
75-81
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सोशल मीडिया के युग में युवा समाज: डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति का विमर्श
Author: अंजू कुमारी

सारांश
यह शोध-पत्र सोशल मीडिया के युग में युवा समाज की बदलती संरचना का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्र डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव और नई पहचान-राजनीति है। शोध मुख्यतः द्वितीयक आँकड़ों पर आधारित है, जिनमें DataReportal, IAMAI-Kantar, ASER, UNICEF, Pew Research Center तथा प्रमुख समाजशास्त्रीय अध्ययनों का उपयोग किया गया है। विश्लेषण को सांख्यिकीय आधार देने के लिए 18–25 वर्ष आयु-वर्ग के 200 युवाओं पर आधारित एक संरचित सर्वेक्षण-डेटासेट का परीक्षण भी प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्ष बताते हैं कि सोशल मीडिया ने युवाओं को नागरिक अभिव्यक्ति, सामाजिक मुद्दों पर भागीदारी और पहचान-निर्माण के नए अवसर दिए हैं, पर साथ ही डिजिटल थकान, सामाजिक अलगाव, प्रदर्शन-दबाव, ऑनलाइन ध्रुवीकरण और एल्गोरिथ्मिक पहचान-राजनीति जैसी चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। अध्ययन यह रेखांकित करता है कि सोशल मीडिया को केवल संचार-माध्यम नहीं, बल्कि समकालीन युवा समाज की सांस्कृतिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में समझना आवश्यक है।
मुख्य शब्द: सोशल मीडिया, युवा समाज, डिजिटल सक्रियता, सामाजिक अलगाव, पहचान-राजनीति, डिजिटल स

Paper Title:
छायावादी कविता में व्यक्तित्व-निर्माण, आत्मबोध और मानवीय मूल्य
Author Name:
नेहा कुमारी
Country:
India
Page No.:
82-89
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छायावादी कविता में व्यक्तित्व-निर्माण, आत्मबोध और मानवीय मूल्य
Author: नेहा कुमारी

छायावादी कविता हिन्दी साहित्य की आधुनिक चेतना का एक महत्त्वपूर्ण चरण है, जिसमें व्यक्ति, आत्मा, प्रकृति, सौंदर्य, रहस्य, करुणा और मानवीय संवेदना को विशिष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति मिली। छायावाद को सामान्यतः आत्मपरक काव्यधारा कहा जाता है, परंतु इसकी आत्मपरकता संकीर्ण व्यक्तिवाद नहीं है; वह मनुष्य के आंतरिक विकास, आत्मबोध, स्वतंत्र व्यक्तित्व और उच्चतर मानवीय मूल्यों की खोज से जुड़ी हुई है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा की कविता में व्यक्तित्व-निर्माण केवल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, नैतिक और आध्यात्मिक साधना के रूप में सामने आता है। प्रसाद के यहाँ आत्मबोध सांस्कृतिक स्मृति और मानव-गरिमा से जुड़ता है; पंत के यहाँ प्रकृति-सौंदर्य के माध्यम से मनुष्य के संवेदनात्मक विकास का मार्ग खुलता है; निराला के यहाँ व्यक्तित्व विद्रोह, स्वाभिमान और सामाजिक करुणा से निर्मित होता है; महादेवी वर्मा के यहाँ आत्मबोध वेदना, करुणा और आध्यात्मिक एकांत के माध्यम से मानवीय संवेदना को विस्तार देता है। इस शोध-पत्र में छायावादी कविता के आधार पर यह वि

Paper Title:
बिहार पंचायती राज में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी: प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण का अध्ययन
Author Name:
राजेश कुमार पुर्वे
Country:
India
Page No.:
90-97
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बिहार पंचायती राज में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी: प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण का अध्ययन
Author: राजेश कुमार पुर्वे

सारांश
बिहार पंचायती राज व्यवस्था में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की भागीदारी भारतीय लोकतंत्र के सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता और स्थानीय स्वशासन के त्रिस्तरीय संबंध को समझने का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करती है। 73वें संविधान संशोधन ने पंचायतों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण का संवैधानिक ढाँचा निर्मित किया, जबकि बिहार ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण देकर इस प्रक्रिया को अधिक व्यापक बनाया। इस शोध-पत्र में दलित महिला जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक भागीदारी को प्रतिनिधित्व, नेतृत्व और सशक्तिकरण के तीन विश्लेषणात्मक आयामों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन पूर्णतः द्वितीयक स्रोतों पर आधारित है, जिसमें संविधान, बिहार पंचायती राज अधिनियम, सरकारी रिपोर्टों, पूर्व शोधों और उपलब्ध सांख्यिकीय सामग्री का उपयोग किया गया है। निष्कर्ष संकेत करते हैं कि आरक्षण ने दलित महिलाओं की संख्यात्मक उपस्थिति को मजबूत किया है, किंतु निर्णय-निर्माण में वास्तविक भागीदारी अभी भी जाति, पितृसत्ता, आर्थिक निर्भरता, प्रशासनिक प्रशिक्षण की कमी और ‘मुखिया-पति’ जै

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